कांग्रेस के सामने हैं ये 5 चुनौतियां

अहमदाबाद : गुजरात विधानसभा चुनाव इस साल दिसंबर में होने हैं. राज्य में कांग्रेस कई सालों से सत्ता में नहीं है. इस बार कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बीजेपी से पहले ही अपने चुनावी प्रचार की धुआंधार शुरुआत की है. बदले-बदले से नजर आ रहे राहुल गांधी ने पिछले 10 दिन में ऐसे बयान दिए हैं जिसकी उम्मीद बीजेपी तो क्या कांग्रेस के नेताओं ने भी नहीं की होगी.

खास बात यह है कि ऐसा पहली बार है कि राहुल को सुनने आई जनता उनके बयानों को सुनकर ताली बजा रही है. राहुल सभा में स्थानीय मुद्दों पर भी अच्छा खासा जोर दे रहे हैं. कांग्रेस के लिए इस बार लड़ाई इसलिए भी आसान नजर आ रही है कि इस बार चुनाव में चेहरा नरेंद्र मोदी नहीं होंगे और अमित शाह भी अब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. हालांकि बीजेपी भी इस बार 150 सीटों का लक्ष्य लेकर चल रही है. इन सभी चुनावी गुणा-भाग के बीच कांग्रेस के लिए गुजरात की धरती पर करिश्मा कर देना इतना आसान नहीं होगा. राज्य में उसके सामने भी कई चुनौतियां है.

किसी दमदार चेहरे का न होना : 

कांग्रेस के सामने गुजरात में यह सवाल हमेशा सालता रहा है. वह भले ही कई सालों से विपक्ष में बैठ रही हो लेकिन इन सालों में वह यहां से कोई बड़ा नेता तैयार नहीं कर पाई जिसका असर समूचे राज्य में दिखता हो. शंकर सिंह वाघेला के कांग्रेस छोड़ने के बाद स्थिति और भी विकट हो गई है. चुनावी रैलियों में जब प्रधानमंत्री गुजराती अस्मिता को केंद्र में रखकर भाषण देंगे तो उसका जवाब देने के लिए कम से कम एक ऐसा चेहरा जरूर होना चाहिए जो गुजरात से हो.

कमजोर संगठन 

संगठन के मामले में भी कांग्रेस बीजेपी से कोसो पीछे है. बीजेपी के पास जहां आरएसएस की संगठनात्मक ताकत है तो साथ ही कार्यकर्ताओं की पूरी फौज है. बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के समय से ही ‘पन्ना प्रमुख’ को तरजीह दी जाती रही है. उत्तर प्रदेश के चुनाव में पन्ना प्रमुखों का शानदार जीत में अहम योगदान माना जाता है.

कौन होगा मुख्यमंत्री पद का चेहरा

अभी तक यह माना जा रहा है कि बीजेपी की ओर मुख्यमंत्री पद के दावेदार विजय रूपाणी होंगें. लेकिन कांग्रेस की ओर से कौन होगा यह अभी तय नहीं है. अगर कांग्रेस बिना किसी चेहरे के चुनाव लड़ती है तो यह उसके लिए घातक साबित हो सकता है क्योंकि जब संगठन कमजोर तो कम से कम एक दमदार चेहरा जरूरी है.

पाटीदारों पर ज्यादा भरोसा

यह बात सही है कि आरक्षण की मांग को लेकर गुजरात में पाटीदार समुदाय बीजेपी सरकार से दो-दो हाथ कर चुका है. कांग्रेस इन पाटीदारों को अपने पक्ष में लाने की पूरी कोशिश कर रही है. पाटीदार गुजरात में बीजेपी का कोर वोट बैंक माने जाते हैं. अगर इनके वोटों में थोड़ा सा भी स्विंग होता है तो बीजेपी को बड़ा नुकसान हो सकता है. लेकिन कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि पाटीदारों आंदोलन के बाद हुए निकाय चुनाव में बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज कर चुकी है. अभी कुछ दिन पहले भी स्थानीय चुनाव में बीजेपी ने 8 में से 6 सीटों पर जीत दर्ज की है. इसलिए कांग्रेस को प्लान बी पर काम जरूर करना चाहिए.

मोदी का अति विरोध कहीं नुकसान न कर जाए

अगर बीजेपी उनके ‘मोदी विरोध’ को ‘गुजरात विरोध’ में बदलने में कामयाब हो जाती है, जैसा कि पहले भी ऐसा हो चुका है तो कांग्रेस के लिए मुश्किल हो सकती है. इसलिए राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के दूसरे प्रचारकों को स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा जोर देना चाहिए क्योंकि राज्यों में सत्ता विरोधी लहर स्थानीय मुद्दों पर होती है न कि राष्ट्रीय मुद्दों पर.

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