समलैंगिकता को अपराध माना जाए या नहीं, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज

समलैंगिकता को अपराध बनाने वाली आईपीसी की धारा 377 खत्म करने के लिए दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट आज से सुनवाई करेगा. इससे पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि इस विषय पर उसे हलफनामा दायर करने के लिए और अधिक समय चाहिए, इसलिए सुनवाई को चार सप्ताह टाल दिया जाए. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने कहा, “इसे स्थगित नहीं किया जाएगा। जब एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे हैं तो वे इस अहम मामले को टालना क्यों चाहते हैं।” उधर, भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने समलैंगिकता को हिंदुत्व के खिलाफ बताया।

इस बीच भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने समलैंगिकता को ‘हिंदुत्व विरोधी’ बताते हुए ऐसे रुचि रखने वाले लोगों का इलाज कराने की बात की है. उन्होंने कहा, ‘ये सामान्य चीज नहीं है. हम इसका जश्न नहीं मना सकते हैं. ये हिंदुत्व के खिलाफ है. हमें मेडिकल रिसर्च में धन लगाकर पता करना चाहिए कि क्या इसका इलाज हो सकता है.’

जानिए क्या है आईपीसी की धारा 377

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है। आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ सेक्स करता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा। उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती है।

जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे लोग जो अपनी पसंद से जिंदगी जीना चाहते हैं, उन्हें कभी भी डर की स्थिति में नहीं रहना चाहिए। स्वभाव का कोई निश्चित मापदंड नहीं है। नैतिकता उम्र के साथ बदलती है। सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा, “ये सामान्य बात नहीं है। हम इस पर खुशी नहीं मना सकते। ये हिंदुत्व के खिलाफ है। अगर ये ठीक हो सकता है तो हमें मेडिकल शोध पर खर्च करना चाहिए। सरकार को इस मामले की सुनवाई के लिए 7 या 9 जजों की बेंच बनानी चाहिए।”

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