इन 2 हालातों में मन को न होने दे बेकाबू, वरना कर बैठेंगे खुद का नुकसान

श्रीमद्भागवत हिंदू धर्म के सबसे खास ग्रंथों में से एक माना जाता है। यह ग्रंथ सबसे खास इसलिए है क्योंकि इसमें दिए गए श्लोक और नीतियां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कही हैं। इस ग्रंथ में बताई गई नीतियां न सिर्फ उस समय उपयोगी थीं, बल्कि आज के समय में भी बहुत अधिक महत्व रखती हैं।

श्रीमद्भागवत में ऐसी दो परिस्थितियों के बारे में कहा गया है, जो हर किसी के जीवन में बार-बार आती हैं। इन परिस्थितियों में मनुष्य कई बार मन को काबू में नहीं रख पाता और खुद का ही नुकसान कर बैठता है। इसलिए, हर किसी को इन दो हालातों का सामना बड़ी ही सूझ-बूझ से और मन को वश में रखकर करना चाहिए।

जानें कौन सी हैं वे दो परिस्थितियां

न प्रह्दष्येत प्रियं प्राप्त नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः।।

पहली स्थिति है दुःख या परेशानी की-

कई लोग अपने बुरे समय से अपना धैर्य खो देते हैं और अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने मन के अधीन हो कर ऐसे काम करने लगते हैं, जो उन्हें कभी नहीं करना चाहिए। दुःख ही एक ऐसा समय होता है, जब भी मनुष्य आसानी से गलत रास्ते पर चलने या अनैतिक काम करने को मजबूर हो जाता है। इसलिए, हर किसी को यह बात समझनी चाहिए कि कैसा भी समय हो वह हमेशा नहीं टिकता। अगर अपने बुरे या परेशानी के समय में समझदारी से काम लें और किसी भी रूप में अधर्म न करें तो, जल्द ही उसका अच्छा समय भी आ ही जाता है। इसलिए, वर्तमान में दुःख और परेशानी क्यों न हो मनुष्य को अपना मन वश में रखकर सूझ-बूझ से हर काम करना चाहिए।

दूसरी स्थिति है खुशी या सुख की-

सामान्यतः जब भी कोई बहुत खुश होता है, तब वह अपने मन को वश में रखने की जगह खुद उसके वश में हो जाता है। खुशी में कई बार हम ऐसी कुछ बातें कह जाते हैं, जो भविष्य में हमारे लिए पूरा कर पाना संभव न हो या ऐसा कुछ कर जाते हैं, जिसके बुरे परिणाम हमें भविष्य में झेलना पड़ सकते हैं। इसलिए, हर किसी को यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि कोई भी खुशी हर समय हमारे साथ नहीं रहती, इसलिए खुशी या सुख के समय अपने मन को अपने वश में रखें। साथ ही अपने शब्दों और कार्यों का चुनाव सोच-समझ कर करें।

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